पर्यावरण
कल तक तो सुस्ताते थे ,
मेरी छाँव में।
आज मेरे ही जड़ को काटने आये है,
दबे पाँव में।
अब तक तो धरोहर था,
इस गाँव में।
मुझे काटने आये है,
दबे पाँव में।
जब जाना था नदी पार,
तब बैठ जाते थे मेरे नाव में।
मुझे काटने आये है,
दबे पाँव में।
कितनी मीठी आवाज थी,
चिड़ियों की।
शोरगुल होता था,
कौओं की काँव काँव में।
मुझे काटने आये है,
दबे पाँव में।
डॉ. प्रदीप निर्णेजक परसदा
मेरी छाँव में।
आज मेरे ही जड़ को काटने आये है,
दबे पाँव में।
अब तक तो धरोहर था,
इस गाँव में।
मुझे काटने आये है,
दबे पाँव में।
जब जाना था नदी पार,
तब बैठ जाते थे मेरे नाव में।
मुझे काटने आये है,
दबे पाँव में।
कितनी मीठी आवाज थी,
चिड़ियों की।
शोरगुल होता था,
कौओं की काँव काँव में।
मुझे काटने आये है,
दबे पाँव में।
डॉ. प्रदीप निर्णेजक परसदा
दोस्तों धन्यवाद
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